What Should be done

WHAT SHOULD BE DONE BY GOV. & MCI:-

  1. Inclusion of few basic things in our medical curriculum.
  2. Awareness of prevalence data of causes (factors) of chronic diseases in normal healthy
    population to doctors & general public.
  3. RDA (Recommended dietary allowance) & normal range of laboratiory parameters
    should be modified or another optimal value should be given along with these values.
  4. PRIMARY/IDIOPATHIC/ESSENTIAL labelling for these chronic lifestyle diseases should be abolished from our books.

Chronic Diseases( Root causes and researches)

हम लम्बी बीमारियों (Chronic Non Communicable Diseases) को भी Acute diseases (Communicable Diseases = जल्द होने वाली) की तरह ही सोचते हैं, इलाज करते हैं और इलाज के परिणाम की आशा करते हैं। ।Acute Diseases में हमारी आधुनिक चिकित्सा वरदान की तरह है। यें अक्सर एक कारण की वजह से होती हैं और उस कारण को दूर करने से वह बीमारी ठीक हो जाती है और जल्द परिणाम भी सामने आ जाता है। लेकिन Covid 19 जैसी महामारी हमें संकेत देती है कि इन Acute Diseases में भी हम Deep Root Causes को ठीक करके बहुत अच्छा परिणाम पा सकते हैं। लम्बी बीमारियों (Chronic Diseases) को हम समझते हैं कि इनका भी कोई एक कारण होना चाहिए। जब हमें एक कारण समझ में नही आता है, तो हम इन बीमारियों को Idiopathic / Primary / Essential (सही कारण ज्ञात नही है) का लेबल लगा देते हैं। हम इन्हे Multifactorial (Multiple factors) diseases भी कहते हैं। यदि इन बीमारियों के अनेक कारण हैं, तो हमें इन सभी कारणों को एक साथ दूर क्यों नही करना चाहिए ? ये बीमारियाँ कैसे और कितने समय बाद हमें पता चलती हैं और किन Stages से होकर गुजरती हैं, इन सबकी सही जानकारी हमारी standard books द्वारा नही दी जा रही है।

हमें इन बीमारियों के होने और Chronic Disease Concept की सही जानकारी नही है। कारणों के दशकों तक मौजूद होने के बावजूद ये बीमारियाँ और उनसे होने वाली परेशानियाँ सामने नही आती। तो यह कैसे सम्भव है कि इन सभी कारणों को खत्म करने के बाद हम इनके परिणामों की आशा जल्द होने वाली (Acute) बीमारियों की तरह तुरन्त होते हुआ महसूस करें। लेकिन इसका मतलब यह नही है कि हम इन्हे दूर भी न करें।

यदि हमें इन बीमारियों को तेजी से आगे बढने से रोकना है और उनके अति गम्भीर परिणामों से अपने को बचाना है, तो इनके मूल कारणों को खत्म करना ही होगा। किसी भी समस्या को पूर्णतः समाप्त करने के लिये हम उसके मूल कारणों को ही ठीक करते हैं। ये लम्बी बीमारियाँ जिन कारणों से होती हैं|  वे सभी आधारभूत (Basic) कारण हैं और आधुनिक विज्ञान द्वारा बताये गये हैं। W.H.O. द्वारा इनके आंकडे दिये गये हैं। हमारा आधुनिक विज्ञान भी इस बात से सहमत है कि इन कारणों के मौजूद रहते हमारे शरीर के किसी भी अंग के Biochemical & metabolic functions सही तरह से कार्य नही कर सकते। यदि ऐसा है, तो हम इन कारणों को ठीक करने पर ध्यान क्यों नही दे रहे हैं। वास्तव में हमें इन कारणों की जानकारी नही है और सही तरीके से हमारी Medical Books में नही बताया जा रहा है। कारणों के स्थान पर लिखा गया है इनका सही कारण ज्ञात नही है। (Idiopathic/ Primary/ Essential / Genetic/ Heredo- Familial)

हमारी Medical books में इन आधार भूत चीजों को क्यों नही दिया जा रहा है ? इस प्रश्न के उत्तर जानने के प्रयास में बहुत सी, आश्चर्यजनक और चोंकाने वाली बातें सामने आई। प्रथम तो यह, कि हम पिछले लगभग 28 सालों से Evidence Based Medicine ( EBM) की प्रैक्टिस कर रहे हैं। Evidence का मतलब है सबूत। हम सही तरह से किये गये अध्ययन एवं शोध (RCT & Double Blind Study) के आधार पर ही जो सही होता है, उसी तरह से इलाज करते हैं। देखने और सुनने में यह बहुत सही लगता है। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी सामने आया। यें सभी रिसर्च एक तरफा (One Sided) है। इन रिसर्च में केवल एवं केवल दवाईयों का अध्ययन ही सम्भव हैं क्योंकि इनका पेटेंट कराया जा सकता है और कुछ सालों में रिसर्च पर लगे हुये पैसे को वसूल किया जा सकता है। जो आधारभूत कारण हैं उन्हे पेंटेंट नही किया जा सकता। इसलिये कोई भी इनकी रिसर्च में पैसा नही लगाना चाहता। हमारी अधिकतर रिसर्च (>95 %) के लिये Drug Industry का ही पैसा लगता है। हमारे अधिकतर Protocols और Medical Guidelines पर drug industry का ही प्रभाव है।

कुछ व्यक्तियों एवं समूहों ने इस समस्या को पहले भी उठाया है और रिसर्च द्वारा सिद्ध भी किया है। लेकिन उनकी रिसर्च पर किसी ना किसी तरीके से प्रश्न चिन्ह लगा दिया जाता है। सबसे बडी चोंकाने वाली बात है, दवाईयों की रिसर्च के डाटा का प्रस्तुतीकरण (Misleading Statistics and Misframing)। इसके द्वारा कोई भी Drug जो कि किसी बीमारी में कम असरदार है, उसके असर को बढाकर और उनके दुष्प्रभावों को कम करके प्रस्तुत किया जा रहा है। इसे इस चतुराई से किया जाता है कि बडे-बडे स्तर पर भी हम लोग (Doctors) नही समझ पाते हैं। इस तरह से ये दवाईयाँ प्रभावहीन तो हैं ही, उल्टे इनके दुश्प्रभाव भी हमारे स्वास्थ्य पर सामने आने लगते हैं।

वास्तव में इन आधारभूत विषयों पर रिसर्च की आवश्यकता ही नही है। केवल इतना ही काफी है कि यें असामान्य हैं जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O.) के आंकडों द्वारा सिद्ध है। फिर भी हम इन पर ध्यान क्यों नही दे रहे हैं। हमारी Medical Books में Chronic Disease Concept की जानकारी और इन आधारभूत चीजों का अधिकतर (>90%) व्यक्तियों में असामान्य होने की जानकारी होना आवश्यक है। ऐसा होते ही हमारी सोच और इलाज करने का हमारा तरीका पूर्ण रूप से बदल जायेगा और हम स्वयं एवं देश का स्वास्थ्य और बीमारियों में लगने वाला 80% तक पैसा बचा पायेंगे।

हम लोग Evidence Based Medicine की प्रैक्टिस करते है। इसके तीन बिन्दु है। मुख्य रूप से Research में जिनके परिणाम सबसे अच्छे हैं उन दवाईयों को ही हम अपने मरीजों को बीमारियों में देते हैं। ये Research केवल Opinion नही बल्कि Facts होते हैं जो बहुत अच्छी तरह से टैस्ट करके ही बन पाते हैं। लेकिन ये Facts केवल Research DATA हैं। हमें इन्हे सच (TRUTH) की कसौटी पर कसना होगाहमें यह देखना होगा कि कही इनमें आधा सच तो नही है। हमें Relative or Absolute के फर्क को समझना होगा। हमें देखना होगा कि यें इन बीमारियों में हम जो Evidence based / DATA Based इलाज कर रहे हैं, उनमें केवल दवाईयों का इस्तेमाल ही क्यों है ? इन दवाईयों के साथ जो हमारे अन्दर आवश्यक पदार्थों की कमी है, उनकी भी पूर्ति करने पर हमारा जोर क्यों नही है ? इन पर हमारी Research क्यों नही होती जिनसे पता चले कि अकेले दवाई असरदार है या फिर यदि हम दवाईयों के साथ इन आवश्यक पदार्थो की पूर्ति भी करें, तो दवाईयाँ अधिक असरदार होगी ? क्या इन Research करने का कोई आर्थिक पहलू तो नही है ? क्या इन आवश्यक पदार्थो पर Research इसलिये नही है क्योंकि इन्हे पेंटेंट नही कराया जा सकता और इन Research के बाद कोई आर्थिक लाभ नही लिया जा सकता ? क्या वास्तव में इन पर कोई Research नही है ? यदि हैं, तो हम इस ओर ध्यान क्यों नही दे रहे हैं ?

हमने कई देशों और कई अन्य विश्वसनीय स्रोत की गाईडलाइन्स (Guide Lines) का अध्ययन किया। इनमें काफी अंतर मिला। कुछ तो एकदम विपरीत है। अधिकतर बीमारियों में इण्डिया की कोई भी गाइड लाइन्स नही है और हम अन्य देशों की गाइडलाइन्स का ही अनुसरण करते हैं। जैसे विटामिन डी का उदाहरण लें तो विभिन्न गाइडलाइन्स जैसे U.K. IOM ( Institute of Medicine), Dr Mercola, Dr. Hollick, Endocine Society आदि की Guide lines में काफी अंतर है। आम जनता में विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O.) द्वारा दी गई अति आवश्यक पदार्थो (Essential Nutrients) की कमी (Prevalence Statistics) पर किसी भी देश की Health Advisory का ध्यान नही है। 80% से भी अधिक बीमार और स्वस्थ लोगों में पाँच या उससे अधिक आवश्यक पदार्थो की कमी है। लेकिन इन बीमारियों के कारणों का पता लगाने (Screening) या उनके इलाज में इन्हे ठीक करने की तरफ किसी का ध्यान नही हैं। इन आवश्यक पदार्थो की कमी के कारण किसी भी अंगों की क्रियाओं (Biochemical Reactions) का सही तरह से होना सम्भव ही नही हैं। यही इन बीमारियों का सबसे बडा कारण है। हमारे चिकित्सा अनुसंधान (Medical Research) इस ओर ध्यान नही दे रही हैं। बल्कि इस ओर ध्यान देने वाले अनुसंधानों पर भी प्रश्न चिन्ह लग जाते हैं, और जिन पर प्रश्न चिन्ह नही लगा है, उन्हे भी आधा अधूरा ही बताया गया है, और अधिक जोर नही दिया गया हैं। विभिन्न एजेन्सी द्वारा एक ही विषय पर किये गये अनुसंधान (Resarch) के परिणाम विपरीत भी हैं। इन सबके कारण यह निर्णय कर पाना भी बडा मुश्किल हो जाता है कि सच क्या है ? इन सब विषयों पर हमारी (इण्डिया की) गाइड लाइन न के बराबर हैं। इन सब विषयों पर ध्यान देने की जरूरत है। इन पर भारत सरकार /Medical Education Board/MCI/ Health Ministry को अविलम्ब ध्यान देने की जरूरत हैं। इन सबसे बीमारियों पर होने वाले एक बहुत बडे खर्च को बचाया जा सकता है। हमारे चिकित्सा पाठ्यक्रम में इन सभी मूलभूत कारणों की ओर ध्यान देने और इस तरह से सोचने की जरूरत है।

हम इन आधारभूत आवश्यक पदार्थो को सही किये बिना वास्तविक Evidence Based Medicine की प्रैक्टिस नही कर पा रहे हैं। हमें अपने System में कुछ भी बदलाव करने की जरूरत नही है। हमें केवल एक कार्य करना है कि जो भी हम इन बीमारियों में कर रहे हैं, उसके साथ ही इन आधारभूत चीजों (True Root Causes) को भी असरदार तरीके से ठीक कर लिया जाये। इन्हें हमें प्राकृतिक (Natural) तरीके से दूर करना होगा। इसके बाद भी यदि पोषक पदार्थों (Nutrients) का स्तर सही स्तर पर नही आता, तो उन्हे अतिरिक्त मात्रा में सप्लीमेंट के रूप में लेना होगा। ऐसी कुछ रिसर्च भी सामने आ जाती हैं, जो इन पर प्रश्न चिन्ह लगा देती हैं। लेकिन यें आधारभूत (Basic) चीजें हैं और यदि हम इन्हें प्राकृतिक रूप से लेते हैं और संतुलित तरीके से सही स्तर को ध्यान में रखकर सावधानीपूर्वक इन्हे अधिक स्तर पर आने से रोककर सप्लीमेन्ट लेते हैं, तो इनका बुरा प्रभाव हो ही नही सकता।

ऐसा करते ही हमें दवाईयों की आवश्यकता 90% से भी कम हो जायेगी। हम अपने देश के 80% स्वास्थ्य बजट को कम करने में भी सफल हो पायेंगे। निष्कर्ष यह है कि हमें अपनी शिक्षा पद्धति (Medical Curriculum) में इन मूल कारणों पर जोर (Emphasis) देना होगा और जो चिकित्सक अभी प्रैक्टिस में हैं उनके लिये एक जागरूकता अभियान चलाना होगा। इस तरह से हम अपने इन्ही संसाधनों से ही बिना कुछ अतिरिक्त खर्च किये अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल हो पायेंगे।