कैसे कम हो जायेगा स्वास्थ्य बजट ?

लंबी बीमारियों के मरीजों की संख्या का बढ़ना और इन बीमारियों को डॉक्टर्स को दिखाने के बावजूद इनकी तीव्रता और बुरे परिणामों के बढ़ते जाने का मुख्य कारण है डॉक्टर्स को बीमारियों के कारणों की जानकारी का न होना । सरकार और मेडिकल कौंसिल (MCI) द्वारा हमारी मांगो को मानने के कुछ ही वर्षो पशचात हमारा और हमारे देश का स्वास्थ्य बजट 80% से भी कम हो जायेगा । हमें केवल एक कार्य करना होगा । कुछ आधारभूत चीजोें और लंबी बीमारियों के कारणों को हमारे शिक्षा पाठ्यक्रम में लगेगा । इसमें कोई भी अतिरिक़्त व्यय नहीं करना होगा । इन कारणों का ज्ञान एम.बी.बी.एस. स्तर पर होते ही इसका असर प्रत्येक उच्च विभाग (Speciality) में दिखाई देगा । डॉक्टर्स के मरीज और मर्ज को देखने का तरीका बदल जायेगा । उनके इलाज में कारणों का इलाज देखने को मिलेगा । सभी विभागों में मर्ज की शुरुआत में ही हम उन कारणों पर कार्य करेंगे । बीमारी आगे ही नहीं बढ़ेगी ।

उदाहरण के लिये बाल रोज विशेषज्ञ के पास जब भी कोई बच्चा किसी भी छोटी या बड़ी शिकायत से आयेगा तो इन कारणों को सोचा जायेगा । बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक विकास में कमी (Delayed Milestones) , बच्चों के व्यवहार की समस्याऐ ( बच्चों का आक्रामक व्यवहार = ADHD), स्कूल में पढ़ाई में पिछडना , मोटापा , वजन न बढ़ना , लम्बाई का न बढ़ना , बालों का अधिक झड़ना , बार – बार खांसी – जुकाम व गला खराब होना , दस्त लगना , बुखार आना , खून की कमी का होना आदि समस्याऐ होने पर जब भी बाल रोग विशेषज्ञ इन कारणों को माता – पिता को बतायेंगे तो शायद ही कोई माता – पिता हो जो इस पर ध्यान न दे ।

जच्चा – बच्चा रोग विशेषज्ञ (Obstetrician) के पास जब कोई स्त्री गर्भावस्था के दौरान आयेगी तो इन कारणों को पति – पत्त्नी को बताया जायेगा । जिससे कि उसका बच्चा सही तरह से गर्भ में पले और उसका सही तरह से मस्तिष्क और शरीर का विकास हो । केवल इस स्तर तक ही हमारे आधे से अधिक बच्चों में आगे जाकर जो बीमारियाँ होनी थी , वह नहीं होंगी । दस वर्षो के पशचात जैसे – जैसे बच्चे को समझ आती हैं । इसमें माता- पिता के साथ उसका भी योगदान जुड़ जायेगा । छोटी हो या बड़ी जिन समस्याओं में भी बच्चा चिकित्स्क के पास जायेगा , उसे उस परेशानी के लिये इन कारणों को दूर करने के लिए कहा जायेगा । उदाहरण के लिए बच्चे की नजर कमजोर होने (चश्मा लगने) पर उसे इन कारणों को दूर करने की सलाह दी जाएगी । इससे चश्मे का नम्बर तो अधिकतर बच्चों में बढ़ेगा ही नहीं , वरन वह आगे होने वाली अन्य खतरनाक बीमारियाँ (डायबीटिज ,हाई ब्लड प्रेशर ,कैंसर ) आदि से बच जायेंगे । इस तरह से 20 सालों तक आते – आते अन्य 25 % बच्चों में बीमारियों के होने की सम्भावना खत्म हो जायेगी । छोटी – छोटी परेशनियों में चाहे वह थकान (Fatigue) हो या शरीर में दर्द (Ache & Pains), माहवारी की परेशानी हो या सिर दर्द या दाँतो की बीमारी । हमें अपने चिकित्स्क (Physician, Orthopedician, Gynecologist, Dentist) से इन कारणों को खत्म करने की राय मिलेगी । 30 साल तक आते – आते 80% व्यक्तियों में , जिसमें बीमारियाँ होनी थी , उन्हें होगी ही नहीं । बड़ी बीमारियों के पता चलना की शुरुआत ही अक्सर 30 के बाद होती है । 20% व्यक्ति जो बीमार होंगे , उसमे बीमारी होने पर उन कारणों को खत्म करने के लिए कहा जायेगा । उनकी बीमारी का आगे बढ़ना बंद हो जायेगा । उन व्यक्तियों के बुरे परिणाम नहीं होंगे , तो स्वास्थ्य बजट अपने आप ही कम होता चला जायेगा । देश आर्थिक मजबूती (Economic Growth) की ओर बढ़ने लगेगा ।

                हमें इन कारणों को एक स्वस्थ व्यक्ति जिसे बीमारी के लक्षण अभी प्रकट नहीं हुए हैं , उसी अवस्था में खत्म करना चाहिये । लेकिन यह बहुत मुश्किल है क्योकि ये हमारे हाथ में नहीं हैं । यह उस स्वस्थ व्यक्ति के हाथ में है । उसकी मनस्थिति स्वस्थ रहते हुए इसे समझने और करने की नहीं होती है ।

                बीमारी होने पर व्यक्ति जब चिकित्सक के पास आता है तब उसकी मनस्थिति उसकी समझने , मानने और करने की होती है । उसे शुरूआात में ही उन कारणों को खत्म करने के लिए बताया जायेगा तो ऐसा बहुत कम होगा कि वह अपने को न बदले । लेकिन मुश्किल यह है कि जब चिकित्सक को ही जानकारी न हो और वह ही बताने में सक्षम न हो ।